मॉनसून के सीजन में आंखें लाल मतलब कंजंक्टिवाइटिस का खतरा, Ayurvedic treatment of conjunctivitis

मॉनसून के सीजन में आंखें लाल मतलब कंजंक्टिवाइटिस का खतरा, Ayurvedic treatment of conjunctivitis


यह आंख के ग्लोब के ऊपर (बीच के कॉर्निया क्षेत्र को छोड़कर) एक महीन झिल्ली चढ़ी होती है जिसे कंजंक्टिवा कहते है।

कंजंक्टिवा में किसी भी तरह के इंफेक्शन (बैक्टीरियल, वायरल, फंगल) या एलर्जी होने पर सूजन आ जाती है जिसे कंजंक्टिवाइटिस कहा जाता है।

कंजंक्टिवाइटिस बीमारी के लक्षण

- सुबह के वक्त आंख चिपकी मिलती है और कीचड़ आने लगता है तो यह बैक्टिरियल कंजंक्टिवाइटिस का लक्षण हो सकता है।

- अगर आंख लाल हो जाती है और उससे पानी गिरने लगता है, तो यह वायरल और एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस हो सकता है।

- आंख में चुभन महसूस होती है, तेज रोशनी में चौंध लगती है, आंख में तेज खुजली होती है, तो यह एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस हो सकती है।

कंजंक्टिवाइटिस: लक्षण, बचाव और इलाज

कंजंक्टिवाइटिस से बचाव

- कंजंक्टिवाइटिस होने पर मरीज को अपनी आंख दिन में तीन-चार बार साफ पानी से धोनी चाहिए।

- कंजंक्टिवाइटिस अगर इंफेक्शन की वजह से है तो ऐसे शख्स से हाथ नही मिलाना चाहिए, नहीं तो इंफेक्शन हाथ के जरिए स्वस्थ व्यक्ति की आंख में भी हो सकता है।

- ऐसे शख्स का तौलिया या रुमाल भी इस्तेमाल नही करना चाहिए। बरसात के मौसम में स्विमिंग पूल में नहीं जाना चाहिए वरना कंजंक्टिवाइटिस इंफेक्शन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने का खतरा रहता है।

- गर्मी के मौसम में अच्छी क्वॉलिटी का धूप का चश्मा पहनना चाहिए। चश्मा आंख को तेज धूप, धूल और गंदगी से बचाता है, जो एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस के कारण होते हैं।

कंजंक्टिवाइटिस का आयुर्वेदिक इलाज

- कंजंक्टिवाइटिस में स्टेरॉयड वाली दवा जैसे डेक्सामिथासोन (Dexamethasone), बीटामिथासोन (Betamethasone) आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

अगर जरूरी है, तो सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही आई-ड्रॉप्स डालें और उतने ही दिन जितने दिन आपके डॉक्टर कहें। स्टेरॉयड वाली दवा के ज्यादा इस्तेमाल से आंखों को काफी नुकसान हो सकता है।

ये सभी दवाएं जेनरिक हैं। दवाएं बाजार में अलग-अलग ब्रैंड नामों से उपलब्ध हैं।

बारिश का मौसम शुरू हो चुका है और इस दौरान सबसे ज्यादा जो बीमारी लोगों को परेशान करती है वह है आई इंफेक्शन कंजंक्टिवाइटिस । ऐसे में यह सवाल भी लोगों के जेहन में है कि क्या ऐंटीबायॉटिक आई ड्रॉप्स कंजंक्टिवाइटिस के इलाज में कारगर है? इस बारे में हुई रिसर्च की मानें तो आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल नुकसानदेह साबित हो सकता है।


इंटरनैशनल जर्नल ऑप्थैलमॉलजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत कंजंक्टिवाइटिस इंफेक्शन वायरस की वजह से होता है और इसके इलाज में ऐंटीबायॉटिक का कोई रोल नहीं होता। कंजंक्टिवाइटिस एक ऐसी परिस्थिति है जिसमें कंजंक्टिवा- जो आंखों के आगे की सतह में पाई जाने वाली बेहद महीन झिल्ली होती है उसमें जलन और लालीपन आ जाता है और इस वजह से आंखें खुद को सेल्फ लिमिट कर लेती हैं। मॉनसून के सीजन में कंजंक्टिवाइटिस होना सामान्य बात है क्योंकि इस दौरान नमी बहुत ज्यादा रहती है जो बैक्टीरिया और वायरस के ग्रोथ में सहायता करती है।

एम्स के आर पी आई सेंटर के हेड और प्रफेसर डॉक्टर अतुल कुमार कहते हैं, 'ऐंटीबायॉटिक्स पहले इसलिए प्रिस्क्राइब की जाती थीं ताकि कॉर्निया को किसी तरह का सेकंडरी इंफेक्शन न हो। भारत में बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से अमेरिका की तुलना में ज्यादा कंजंक्टिवाइटिस के केस देखने को मिलते हैं। कई मौको पर ऐंटीबायॉटिक्स देना जरूरी होता है। लेकिन इनके बहुत अधिक इस्तेमाल से बचना चाहिए अन्यथा आंखों की सतह को नुकसान पहुंच सकता है।'
सेंटर फॉर साइट के चेयरमैन और मेडिकल डायरेक्टर डॉ महिपाल सचदेव कहते हैं, 'कई बार कंजंक्टिवाइटिस से बचाव के लिए भी ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब की जाती हैं। बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से कंजंक्टिवाइटिस होने का चांस बेहद कम होता है। ज्यादातर केस में इसके लिए वायरस ही जिम्मेदार होते हैं। लेकिन डॉक्टर्स किसी तरह का चांस नहीं लेना चाहते क्योंकि अगर किसी भी वजह से इंफेक्शन और बढ़ता है तो मरीज उन्हें लापरवाही बरतने के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे।'

अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर ऑप्थैलमॉलजी कंसल्टेंट डॉ रंजना मित्तल कहती हैं, 'प्रैक्टिकली यह जांच करवाना संभव नहीं है कि कंजंक्टिवाइटिस का इंफेक्शन वायरस की वजह से है या बैक्टीरिया की वजह से। इसलिए प्रिकॉशन के तौर पर डॉक्टर्स माइल्ड ऐंटीबायॉटिक्स प्रिस्क्राइब कर देते हैं।' वायरस की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस अपने आप ही एक सप्ताह के अंदर ठीक हो जाता है लेकिन डॉक्टर्स कहते हैं कि बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से होने वाला कंजंक्टिवाइटिस कई केस में कॉर्निया तक फैल जाता है। कॉर्निया में इंफेक्शन और घाव आंखों को स्थायी तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है।

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